कई दिनों तक सोचा की यह ब्लॉग लिखू या नहीं और आखिरकार इस तय किया की एक बार लिख ही देता हू||| दरअसल ये ब्लॉग हमारे धर्म को लेकर है लेकिन कोई ये ना सोचे की मैं १००% आस्तिच्क हूँ और कोई ये भी ना सोचे की मैं १००% नास्तिक हूँ|| अब मैं सीधा मुद्दे पर आता हू और यह बात पहले ही साफ़ किए देता हू की अगर मेरे द्वारा पूछे गए सवालो के जवाब किसी के पास भी हो तो बेजिजक ‘कमेन्ट’ करे, आपका स्वागत है|

मैं अभी १९ साल का हूँ और बचपन में ही “रामायण”, “महाभारत” और अन्य धार्मिक पुस्तक पढ़ चूका हू| मैं मोरारी बापू की कथाओ को पसंद करता हू|| यह कुछ सवाल ऐसे है जो मुझे यह सब अध्यात्मिक पुस्तके पढ़ने के बाद ध्यान आये|

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सबसे पहले रामायण से शुरू करता हू| मुझे रामायण बेहद पसंद है और सबसे जादा इसीमे मानता हू लेकिन उसके बावजूद कुछ बाते थोड़ी अटपटी लगी| सबसे पहले बाली के वध से शुरू करता हूँ, क्या जिस प्रकार श्री राम ने बाली का वध किया वो उन उच्चतम आदर्शो के विरुद्ध नहीं था जिनकी शिक्षा हमें रामायण से मिलती है| हालत चाहे कैसे भी हो लेकिन इसके बावजूद जिस प्रकार श्री राम ने बाली को मारा वो युद्ध के नियमों के विरुद्ध नहीं था? दूसरा प्रश्न जो थोडा कठिन लग सकता है, क्या रावण एक महान व्यक्ति नहीं था? जो व्यक्ति साक्षात् शिव को कैलास पर्वत समेत उठाने की शक्ति रखता हो, जिसके सामने नौ ग्रह और तमाम देवता नतमस्तक हो वो कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकता| जिसका वध करने के लिए स्वयं राम को चोदा वर्षों का वनवास लेना पड़े और सहस्त्र योजन समुद्र पार करना पड़े वो कोई सामान्य व्यक्ति कैसे हो सकता है|| यदि आपने युद्ध के अंतिम दिन रावण का भगवान शिव को किया गया संबोधन पढ़ा/सुना हो तो आपको पता होगा की रावण ने क्या कहा| ‘ये शंक्तियाँ तुमने मुझे कोई भिक्षा में नहीं दी, मेरी कठोर साधना और तपस्या से तुम मुझे ते शक्तियाँ देने पर विवश हुए थे| अपार शक्तियाँ पाने पर तो देवताओ भी अहंकार हो जाता है तो मैं तो एक सामान्य मनुष्य हू| मैंने शक्तियाँ अपने बाहुबल से प्राप्त की है और इस पर अहंकार करने का मुजे पूर्ण अधिकार है| इसका जो भी परिणाम होगा उससे भुगतने को मैं तैयार हू||’ उसी दिन रावण ने मंदोदरी से क्या कहा था, ‘मरते वो है जिनकी कीर्ति मर जाती है, रावण की कीर्ति दिगदिगन्त में अमर रहेगी, रावण अमर रहेगा| अगर राम मनुष्य है तो आज युद्ध में मेरे द्वारा मारा जायेगा और अगर पुरुषोत्तम है तो उसे भी यह पता चल जायेगा की रावण के साथ युद्ध करना कितना दुष्कर कार्य है| रावण यानि एकोमेवा द्वितीयो नास्ति, ना भूतो ना भविष्यति”|’ रावण वह एक मात्र पौराणिक व्यक्तित्व है जिसने अपनी लंका में किसी पंडित को नहीं रहने दिया और धर्म के नाम पर चलने वाले पाखंड का हमेशा विरोध किया| कई पुराणों में जिक्र मिलता है की राज्य सँभालने के बाद रावण कभी नहीं सोया, वह रात्रि समय में नगर भ्रमण को जाता था| भले ही रावण एक दानव था लेकिन वह एक ब्राह्मणपुत्र भी था| जरा उन परिस्थितियों पर भी गौर करे जिन्होंने रावण को ‘रावण’ बनने पर मजबूर किया| मैं कोई रावण-भक्त नहीं लेकिन उसके अच्छे गुणों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता|

मुझे रामायण में सब से बड़ी जो समस्या है वो राम के राज्याभिषेक के बाद किए गए ‘सीता-त्याग’ पर| यह कितनी हद तक न्यायोचित माना जाए? क्या किसी एक धोबी के कहने मात्र से अपनी पत्नी का त्याग कर देना उचित था, वो भी जब वह गर्भवती हो| भले ही यह राजधर्म की उच्चतम आदर्शो के अनुरूप हो पर दिल इस बात को योग्य नहीं मानता| कुछ लोग यह कहते है की सितात्याग के बाद राम भी अपने महल में एक वनवासी का जीवन जी रहे थे जो श्रीराम के उच्च आदर्शो के अनुकूल है लेकिन मुझे यह समज नहीं आ रहा की एक गर्भवती महिला को (भूल जाइये की वह अयोध्या की महारानी थी) उससे एक वन में अकेले, उसके हाल पर छोड़ देना कितना स्वीकार्य है? भले यह प्रश्न थोडा तीखा लगे पर जरा सोचिएगा और अगर कोई उत्तर मिले तो कमेन्ट कीजिएगा|

अब मैं एक छोटी सी घटना पर आता हू जो प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश को लेकर है| जब भगवान शिव ने जब गणेशजी का सर अपने त्रिशूल से काट दिया तब देवी पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गई और किसी भी हाल में अपने पुत्र को पुनः जीवित करने को कहा| उस वक्त भगवान विष्णु एक हाथी का सर काट कर श्रीगणेश के सर की जगह लगा कर उन्हें पुनःजीवित करते है| मुजे यह प्रश्न है की बाद में उस हाथी का क्या हुआ? क्या वह मारा गया? अगर हां तो जिस प्रकार श्रीगणेश माता पार्वती के पुत्र है उसी प्रकार वह हाथी भी तो किसी का पुत्र होगा| क्या उसकी माँ की पीड़ा का कोई मोल नहीं?

अब आता हूँ हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘भगवतगीता’ और ‘महाभारत’ पर| सबसे पहले याद हो आपको की भगवान कृष्णा ने गीता में कहा है की ‘इस संसार में हर जगह, हर सजीव एवं निर्जीव वस्तु में मेरा वास है| मेरी इच्छा के सिवा एक पत्ता भी हिल नहीं सकता|’ इसका स्पष्ट अर्थ यह है की जो भी कुछ महाभारत में हुआ वो इश्वर की इच्छा से ही हुआ था| तो क्यों ना यह प्रश्न पूछा जाए की महाभारत के कारण हुए इतने बड़े नरसंहार की क्या आवश्यकता थी? अगर इश्वर चाहते तो ये युद्ध रोका जा सकता था| और अगर मैं यह भी मान लूँ की कौरवो को मारना अति आवश्यक था तो फिर भी उन लाखो बेगुनाह सैनिको की जान जाना ज़रुरी था क्या| कृष्ण के जन्म से पहले देवकी के सात नवजात बालको को कंस ने बड़ी बेरहमी से मार डाला, क्या यह भी ज़रुरी था? क्या कंस के हाथो मासूम प्रजा पर अत्याचार किए जाना जरुरी था? क्या कंस और कौरवो को सीधे-सीधे नहीं मारा जा सकता था? क्या पांडवो द्वारा द्रौपदी को जुए में दाव पर लगाना किसी भी रूप में सही माना सकता है? जब माता कुंती ने बिना देखे अर्जुन से यह कहा था की ‘भिक्षा चारों भाई आपसमें बराबर-बराबर बात लो’ तब द्रौपदी को पाचो पांडवो की पत्नी बना देना उचित था? पितामह भीष्म और द्रौनाचार्य ने अपने निजी वचनों और कर्ज को पूरा करने के लिए कौरवो का साथ दिया, यह जानते हुए भी की यह गलत है| क्या इन दो महापुरुषों द्वारा लिया गया यह कदम राष्ट्र-विरोधी नहीं था, और अगर था तो निजी कारणों के लिए राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारीयाँ भुला देना क्यों ना अनुचित समजा जाए?

मैं यहाँ एक बार फिर साफ़ कर दूँ की नाही मैं किसी धर्म के विरुद्ध कुछ भडकाऊ लेख लिख रहा हूँ और ना ही किसी की भावनाओ को आहात कर रहा हूँ| यह मेरे में उठे कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर पाने की इच्छा मुझे है| कई लोगों से मैंने इस बारे में पूछा लेकिन उनका जवाब था की ‘धर्म और भगवान से प्रश्न नहीं करते’ जो मुझे कतेई समाधानकारक नहीं लगा| अगर किसी के पास भी इनके उत्तर हो तो कृपिया ‘कमेन्ट’ में लिखे|

धन्यवाद!!! जय हिंद!!!

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